किराडपुरा दंगा: पुलिस फायरिंग, संदिग्ध FIR और अधूरी जांच— सच दबाया जा रहा है

किराडपुरा दंगा: पुलिस फायरिंग, संदिग्ध FIR और अधूरी जांच— सच दबाया जा रहा है

छत्रपति संभाजीनगर, २६ मार्च: छत्रपति संभाजीनगर के किराडपुरा इलाके में रामनवमी की पूर्व संध्या पर भड़की हिंसा आज तीन साल बाद भी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। इस घटना में पुलिस फायरिंग के दौरान शेख मुनीरुद्दीन की मौत हुई, लेकिन  सामने आए तथ्य पुलिस की कार्रवाई, दर्ज की गई एफआईआर और प्रशासनिक जांच—तीनों पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।

     घटना की शुरुआत उस वक्त हुई जब किराडपुरा स्थित राम मंदिर के सामने कुछ लोगों द्वारा कथित आपत्तिजनक नारेबाजी की खबर फैली। देखते ही देखते यह अफवाह पूरे इलाके में फैल गई और दो समुदायों के बीच तनाव बढ़ गया। हालात इतने बिगड़े कि दोनों तरफ से सैकड़ों की संख्या में लोग आमने-सामने आ गए। पथराव हुआ, पुलिस वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा।

     स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस ने पहले लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन जब हालात और बिगड़े तो फायरिंग का सहारा लिया गया। पुलिस इंस्पेक्टर अशोक भंडारे और पुलिस इंस्पेक्टर गीता बागवड़े ने अपनी-अपनी पिस्टल से कुल 11 गोलियां चलाने की बात एफआईआर में दर्ज की। एफआईआर, जो 30 मार्च 2023 को दोपहर 3:32 बजे जिंसी पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई, में यह दावा किया गया कि फायरिंग जमाव को तितर-बितर करने के लिए की गई।

       हालांकि, सबसे बड़ा विवाद यहीं से शुरू होता है। एफआईआर में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इन गोलियों से कौन जख्मी हुआ। वहीं दूसरी ओर, इसी फायरिंग में शेख मुनीरुद्दीन को गोली लगी, जिनकी सुबह करीब 7 बजे इलाज के दौरान मौत हो गई।

     पुलिस का दावा है कि मुनीरुद्दीन उस समय उग्र भीड़ के सामने मौजूद थे। लेकिन प्रत्यक्षदर्शी गवाहों और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं। गवाहों के अनुसार, मुनीरुद्दीन अपनी बिल्डिंग के अंदर, बंद गेट के पीछे खड़े होकर बाहर का मंजर देख रहे थे। बिल्डिंग के सभी गेट लोहे के थे और उन पर ताले लगे हुए थे।

      चश्मदीद गवाह शेख इफ्तेखार के अनुसार, गोली लगने के समय वह खुद मुनीरुद्दीन के पास ही मौजूद थे। जैसे ही उन्हें गोली लगी, इफ्तेखार ने उन्हें खींचकर कॉरिडोर में लाया। बाद में अस्पताल ले जाने के लिए गेट के ताले पत्थरों से तोड़ने पड़े, क्योंकि चाबी समय पर नहीं मिल पाई।

     यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर मुनीरुद्दीन बिल्डिंग के अंदर, ताले लगे गेट के पीछे थे, तो नीलिंग पोजीशन (घुटनों के बल बैठकर) से सड़क से चलाई गई गोली उन्हें कैसे लग सकती है? घटनास्थल की बनावट के अनुसार, सड़क और बिल्डिंग के बीच करीब 3 से 3.5 फीट ऊंचा सीमेंट डिवाइडर मौजूद है और बिल्डिंग का गेट सड़क से डेढ़ फीट नीचे है। ऐसे में नीलिंग पोजीशन से चलाई गई गोली का सीधा लक्ष्य तक पहुंचना लगभग असंभव माना जा रहा है।

      इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं फायरिंग किसी और एंगल या ऊंचाई—जैसे राम मंदिर शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के ऊपर से—तो नहीं की गई? या फिर अंधाधुंध तरीके से फायरिंग की गई।

       एफआईआर में खुद पुलिस इंस्पेक्टर अशोक भंडारे ने लिखा है कि घटनास्थल पर दोनों समुदायों के 200-250 लोग आमने-सामने थे और दोनों ही पक्ष दंगों में शामिल थे। इसके बावजूद कार्रवाई सिर्फ एकतरफा हुई और केवल मुस्लिम समुदाय के लोगों को गिरफ्तार किया गया। एक भी हिंदू व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हुई, जिससे पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

     इस पूरे मामले में एक और गंभीर पहलू सामने आता है—मजिस्ट्रेट जांच की प्रक्रिया। सरकार द्वारा आदेशित जांच के तहत एसडीएम, औरंगाबाद ने बाकायदा “जाहीर प्रगटन” (पब्लिक नोटिस) जारी कर लोगों से अपील की थी कि जो भी इस घटना के बारे में जानकारी रखते हैं, वे अपने लिखित बयान प्रस्तुत करें।

       इस अपील के बाद मृतक के बेटे, भाई सहित करीब आठ चश्मदीद गवाहों ने अपने लिखित बयान एसडीएम कार्यालय में जमा किए। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन गवाहों में से किसी भी प्रत्यक्षदर्शी को बयान दर्ज करने के लिए बुलाया ही नहीं गया। केवल मृतक के बेटे और भाई का ही बयान लिया गया।

      इतना ही नहीं, मजिस्ट्रेट द्वारा घटनास्थल का दौरा भी नहीं किया गया। बिना प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और बिना साइट निरीक्षण के ही रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंप दी गई। सवाल उठता है—क्या यही निष्पक्ष जांच की प्रक्रिया है?

       इस मामले में सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस रियाजुद्दीन देशमुख ने स्वतंत्र रूप से जांच कर कई विसंगतियां उजागर कीं। उनके प्रयासों के बाद ही यह मामला सार्वजनिक चर्चा में आया और सरकार को मजिस्ट्रेट  जांच के आदेश देने पड़े।

https://youtu.be/6LZwI6wab3A?si=iC3dP5NgImspTn8j

       वहीं, भारत मुक्ति मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष अलीयार नूरखान और औरंगाबाद जिला अध्यक्ष संतोष सालवे ने भी इस मामले को गंभीरता से उठाया। उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर उन्हें न्याय दिलाने के लिए संगठन के माध्यम से आर्थिक सहयोग जुटाया और औरंगाबाद खंडपीठ में याचिका दाखिल करवाई। यह मामला फिलहाल हाई कोर्ट में विचाराधीन है।

      संतोष साल्वे का आरोप है कि पुलिस ने अपनी गलती छिपाने के लिए एक निर्दोष व्यक्ति को आरोपी बना दिया, झूठी एफआईआर दर्ज की और मजिस्ट्रेट जांच को भी एकतरफा तरीके से पूरा किया गया।

       आज, तीन साल बाद भी न्याय की राह अधूरी है। पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों की मांग है कि इस पूरे मामले में नई सिरे से न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) कराई जाए, दोषी पुलिस अधिकारियों—अशोक भंडारे और गीता बागवड़े—के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए और मृतक के परिवार को उचित मुआवजा व एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाए। 

     किराडपुरा दंगा अब सिर्फ एक पुरानी घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, पुलिस की पारदर्शिता और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की कसौटी बन चुका है।
अब देखना यह है कि सच सामने आता है या फाइलों में दफन होकर रह जाता है।