ट्रम्प की जंग और हकीकत की दीवार — अपनी ही खुफिया रिपोर्ट ने खोली पोल

ट्रम्प की जंग और हकीकत की दीवार — अपनी ही खुफिया रिपोर्ट ने खोली पोल

          रान के खिलाफ युद्ध की भाषा बोलना आसान है, लेकिन उस युद्ध के परिणामों का सामना करना उतना ही कठिन। यही सच्चाई अब अमेरिका की अपनी खुफिया एजेंसियां सामने ला रही हैं। प्रतिष्ठित अमेरिकी अख़बार The Washington Post में कल प्रकाशित लीक रिपोर्ट ने ईरान को लेकर राष्ट्रपति Donald Trump की आक्रामक रणनीति की हवा निकाल दी है।

          अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के संयुक्त आकलन के अनुसार, ईरान पर चाहे कितना भी बड़ा सैन्य हमला क्यों न किया जाए, उससे वहां की सत्ता व्यवस्था तुरंत नहीं गिरेगी। यह आकलन United States National Intelligence Council (NIC) ने तैयार किया है, जो अमेरिका की 18 खुफिया एजेंसियों का सामूहिक मंच है।

          ट्रम्प लगातार ईरान से “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग कर रहे हैं और यह संकेत भी देते रहे हैं कि युद्ध के बाद ईरान की नई सत्ता व्यवस्था वॉशिंगटन की इच्छा के अनुसार बनाई जा सकती है। लेकिन खुफिया रिपोर्ट कहती है कि ईरान कोई ताश का महल नहीं है, जिसे एक झटके में गिराया जा सके।

          रिपोर्ट के मुताबिक, यदि ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei जैसे शीर्ष नेता को भी हटा दिया जाए, तब भी सत्ता का ढांचा टूटने वाला नहीं है। देश की धार्मिक और राजनीतिक संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि वे किसी भी नेतृत्व संकट के बाद भी व्यवस्था को संभाल सकती हैं।

          नए सर्वोच्च नेता का चयन करने की जिम्मेदारी 88 सदस्यीय धार्मिक परिषद Assembly of Experts के पास होती है, जबकि शक्तिशाली सैन्य संगठन Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) भी इस प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

           यानी साफ है कि ईरान की सत्ता केवल किसी एक व्यक्ति के भरोसे नहीं टिकी है। यह संस्थाओं का ऐसा जाल है जिसे बाहर से हमला करके तोड़ना इतना आसान नहीं।

          विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मौजूदा सत्ता को हटाया भी गया तो उसके बाद की स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है। अमेरिकी अधिकारी खुद इसे “डे-आफ्टर प्रॉब्लम” यानी युद्ध के बाद की सबसे बड़ी समस्या मान रहे हैं।

           यदि केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई तो ईरान में सत्ता का खतरनाक शून्य पैदा हो सकता है। पश्चिमी इलाकों में कुर्द गुट और दक्षिण-पूर्व में बलूच संगठन पहले से सक्रिय हैं। ऐसी स्थिति में देश के भीतर संघर्ष भड़कने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

           सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी रिपोर्ट के सामने आने के बाद भी व्हाइट हाउस की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह भी साफ नहीं है कि राष्ट्रपति Donald Trump ने सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने से पहले इस रिपोर्ट को पूरी तरह पढ़ा भी था या नहीं।

          इतना जरूर साफ हो गया है कि जंग के नारे और राजनीतिक बयानबाज़ी एक अलग चीज़ हैं, और जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग।

          अमेरिका के सामने असली चुनौती अब यह है कि अगर युद्ध का रास्ता चुना गया, तो उसके बाद की स्थिति को संभालने की योजना आखिर क्या होगी।

          क्योंकि इतिहास बार-बार यह साबित कर चुका है—जंग शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसका अंत अपने मनमुताबिक करना लगभग असंभव।

डॉ रियाज़ देशमुख, असिस्टंट कमिशनर ऑफ पोलीस (रि) संभाजीनगर (औरंगाबाद)